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बौद्ध धर्म का इतिहास | History Of Buddhism In Hindi PDF Free Download

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By: pdfwale
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विद्वान मानते हैं कि बुद्ध की मृत्यु 400 ई.पू. के आस-पास अथवा उससे अधिक पहले नहीं हुई. तथापि बुद्ध के काल से सम्बद्ध किसी भी शोध का अनुसरण करने के लिए सम्बद्ध स्रोतों का एक नया और आलोचनात्मक अध्ययन अत्यन्त आवष्यक है। बुद्ध की तिथि की गणना के लिए कई विधियों का प्रयोग किया गया है। परन्तु इनमें से अधिकतर विष्वसनीय नहीं हैं, विशेषकर वे जो या तो बहुत बाद की सामग्री पर आश्रित हैं या किसी न किसी रूप में संदिग्ध प्रकृति Bubious nature) की हैं। यहाँ पर हम बुद्ध की तिथि से सम्बद्ध केवल सबसे महत्त्वपूर्ण परिकल्पनाओं (most important hypotheses) पर विचार करेंगे। लेकिन, वास्तविक विषय पर आने से पूर्व, यह ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है कि चंद्रगुप्त तथा अषोक दोनों के सिहासनारोहण की तिथियाँ बुद्ध की तिथि से अविमोचनीय तरीके से जुड़ी हैं। यह न्यूनाधिक निश्चित है कि चंद्रगुप्त ने लगभग 317 ई.पू. में शासन करना आरम्भ किया, यद्यपि कुछ विद्वान इससे कुछ पूर्व की तिथि भी मानते हैं। “ऐण्डामीस (Endamos) द्वारा पुरु (Poros) की हत्या और 317 ई.पू. में भारत से उसका प्रस्थान पर्याप्त संकेत हैं। चंद्रगुप्त की अगुआई में।
बौद्ध कालानुक्रम की समस्याएँ :- भड़का भारतीय विद्रोह इस समय से पूर्व संभव प्रतीत नहीं होता। इस प्रकार “317 ई.पू. से पहले चंद्रगुप्त के अधिकार क्षेत्र की स्थापना होनी असंभव है, हालांकि नन्दों को उखाड़ फेंकने तथा उनके मगध साम्राज्य को प्राप्त करने का उसका विध्वंसक प्रयास 325 ई.पू. तक जा सकता है। अषोक के 13वें शिलालेख में उल्लिखित विभिन्न यूनानी राजाओं के नामों के आधार पर अषोक की राज्यप्राप्ति (accession) की तिथि लगभग 268 ई.पू. रखी जा सकती है और अभिषेक (consecration) की तिथि, जो उसके शासन के चौथे वर्ष में (अर्थात् 3 वर्ष बाद हुआ, लगभग 265 ई.पू.। बुद्ध की तिथि के अध्ययन के लिए प्रयुक्त स्रोत मोटे तौर पर दो भागों में बाँटे जा सकते हैं: वे स्रोत जो तथाकथित दीर्घकालानुक्रम (Long Chronology) का समर्थन करते हैं या वे जो लघुकालानुक्रम (Short Chronology) का ये कालानुक्रम मुख्य रूप से क्रमशः दक्षिणी और उत्तरी बौद्ध किंवदंतियों (Northern and Southern Buddhist legends) पर आधारित हैं। श्रीलंकाई परम्परा में शामिल दक्षिणी किंवदंतियाँ अषोक के अभिषेक को बुद्ध के परिनिर्वाण से 218 वर्ष बाद मानती हैं। इसकी तुलना में, उत्तरी बौद्ध किंवदंतियों अषोक के अभिषेक को बुद्ध की मृत्यु से 100 या 110 वर्ष बाद मानती हैं उन तर्कों का सर्वाच्च सर्वेक्षण, जिन्होंने विद्वानों को यह विश्वास करने पर प्रेरित किया कि बुद्ध की तिथि की गणना दीर्घकालानुक्रम पर आधारित होनी चाहिए. आद्रे बॉरो (Andre Bareau) के 1953 में छपे लेख में पाया जाता है। दक्षिणी बौद्धों ने आरम्भ में बुद्ध की मृत्यु की तिथि को वर्ष 544-543 ई.पू. मान लिया. है, तब भी अजातषत्रु और चंद्रगुप्त के बीच अनेकों राजाओं के राज्यकाल के बारे में यह स्रोत एकमत हैं। इन राजाओं में से एक उदायिन था जिसने अपनी राजधानी राजगृह से बदलकर पाटलिपुत्र में स्थापित की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि यदि हम लघुकालानुक्रम को मान लें तब नन्द वंश की स्थापना अजातशत्रु के शासनकाल के तुरंत बाद हुई प्रतीत होती है। लेकिन दूसरी ओर, यह भी अंकित किया जा सकता है कि पुराण कुछ स्थानों पर सूचना देते हैं। उदाहरणार्थ, प्रद्योत जिसने अवंति से शासन किया, को मगध का षासक बतलाया गया है। लेकिन अब अधिकतर इतिहासकार इस तथ्य से सहमत हैं कि अवंति वंशावली किसी न किसी प्रकार मगध राजवंशों में मिला दी गई थी। विल्हेल्म गायगर द्वारा दी गई कालानुक्रम- संगणना की पुष्टि के लिए तर्कों में से एक प्रमुख तर्क विक्रमसिंघे द्वारा प्रस्तावित यह परिकल्पना थी कि एक कालानुक्रम, जिसका आरम्भ 483 ई.पू. में बुद्ध की मृत्यु के रूप में मानकर हुआ. श्रीलंका में 11वीं शताब्दी के आरम्भ तक प्रचलित था, और कि 544 ई.पू. का बुद्धवर्ष सामान्यतया बाद के समय में स्वीकार किया गया था। तथापि, विक्रमसिंघे की परिकल्पना, जो भ्रातिपूर्ण पूर्वानुमानों पर आधारित थी, बार-बार खण्डित की जा चुकी है।” यह ध्यान देने योग्य बात है कि हालाँकि संशोधित दीर्घकालानुक्रम (Corrected Long Chronology) राजा वट्टगामणी के बाद पूर्णतः विश्वास करने योग्य है,

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